मेरे बीते दिनों की,
व्यस्तताओं की,
निरे ख़ालीपन की;
लड़कपन की, जवानी की,
बुढ़ापे की तरफ़ बढ़ते पगों की ;
चहचहाते शिशु-खगों की
और ख़ाली नीड़ की।
सब कुछ समर्पित है तुम्हें जगदीश !
क्योंकि ये सब कुछ
तुम्हारा ही दिया वरदान है।
आँख होगी बन्द जब
कुछ भी न होगा साथ तब।
मेरे जगदीश !
तुम उस वक़्त भी
रहना मेरे ही साथ में ।
वो वैतरणी तुम्हीं तो पार करवाओगे कान्हा !
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